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बाल विकास की अवधारणा एवं अधिगम से इसका संबंध : बालविकास एवं शिक्षा शास्त्र

By: RF Tembhre   Copy    Share
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बालविकास एवं शिक्षा शास्त्र

पाठ्यक्रम बिंदु (बालविकास एवं शिक्षा शास्त्र) - (अ) बालविकास (Child Development)

बाल विकास की अवधारणा एवं अधिगम से इसका संबंध
बालविकास का अर्थ: माता-पिता के शुक्राणु (Sperm) एवं अण्डाणु (Ovum) के संयोग से बालक (बच्चे) का आविर्भाव होता है। माता के गर्भ में कुछ माह अर्थात् 9 या 10 माह अथवा 240 दिनों तक जब तक बच्चा रहता है तब तक उसका विकास होता रहता है।
मुनरो के अनुसार: "परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था, जिसमें बच्चा भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाता है।"
विकास का अभिप्राय परिवर्तन से है या परिवर्तन एक सतत् प्रक्रिया है जो गर्भावस्था से प्रारंभ होकर परिपक्वता पर समाप्त होती है।
विकास की प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। बालक के जन्म से पूर्व तथा जन्म के पश्चात जो भी परिवर्तन दिखाई देते हैं वे सब विकास के ही अंग हैं।
मानव विकास की प्रथम अवस्था शैशवावस्था है। इसकी अवधि जन्म से लेकर 5 वर्ष मानी जाती है। यही मानव जीवन का आधार भी माना जाता है। यह अवस्था निर्माणकारी अवस्था मानी जाती है।
विकास का अर्थ केवल बड़े होने या कद-भार बढ़ने से नहीं है, विकास में परिपक्वता की ओर बढ़ने का निश्चित क्रम होता है। यह एक प्रगतिशील श्रृंखला होती है। प्रगति का अर्थ भी दिशा बोध युक्त होता है। यह दिशा बोध आगे भी होता है और पीछे भी।
विकास का अर्थ परिवर्तन है, परिवर्तन एक प्रक्रिया है जो हर समय चलती रहती है। इसमें केवल शरीर के अंगों का विकास ही नहीं होता वरन् सामाजिक, सांवेगिक अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों को भी सम्मिलित किया जाता है। यह परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं: (1) मात्रात्मक परिवर्तन और (2) गुणात्मक परिवर्तन।
विकास एक प्रक्रिया होती है जो सतत्, क्रमिक एवं अविरल रूप से चलती रहती है। विकास की प्रक्रिया में बच्चे का शारीरिक, संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, संवेगात्मक, भाषागत एवं सामाजिक विकास होता है। इस प्रक्रिया में बालक का व्यवहार, व्यक्तित्व, स्वभाव, दृष्टिकोण, जीवन के मूल्य, रुचियां एवं आदतें सम्मिलित हैं। विकास की प्रक्रिया में बालक गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोराववस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था आदि पड़ाव से गुजरते हुए परिपक्वता (पूर्णता की स्थिति) प्राप्त करता है।

बाल विकास के अध्ययन में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों का समावेश होता है

(i) गर्भाधान के बाद जन्म लेने के बाद परिपक्वता की स्थिति तक बालक में होने वाले परिवर्तन होते हैं।
(ii) बालक में होने वाले परिवर्तनों का विशेष रूप से आयु के साथ होने वाला क्या संबंध है।
(iii) आयु के साथ होने वाले परिवर्तनों का क्या स्वरूप होता है।
(iv) बालक में होने वाले परिवर्तनों के लिए कौन से कारक उत्तरदायी हैं।
(v) बालक में होने वाले परिवर्तन उसके व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
(vi) बालक में होने वाले गुणात्मक एवं परिणात्मक परिवर्तनों की भविष्यवाणी उसके पूर्व के परिवर्तनों के आधार पर क्या हो सकती है।
(vii) क्या सभी बालकों में विकास एक समान होता है या भिन्नता होती है।
(viii) व्यक्तिगत विभिन्नताओं के लिए किस प्रकार आनुवांशिकी एवं परिवेश का प्रभाव उत्तरदायी होता है।
(ix) बालक के गर्भ में आने के बाद निरन्तर प्रगति लेती रहती है। इस प्रगति का विभिन्न आयु तथा अवस्था विशेष में क्या दुष्परिणाम या स्वरूप होता है।
(x) बालकों की रुचियों, आदतों, दृष्टिकोणों, जीवनमूल्यों, स्वभाव तथा उच्च व्यक्तित्व एवं व्यवहार गुणों में जीवन के समय से ही जो निरन्तर परिवर्तन आते रहते हैं, विभिन्न आयु तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है तथा इस परिवर्तन की प्रक्रिया की क्या प्रकृति होती है।

संक्षेप में कहें तो: विकास का सामान्य अर्थ परिवर्तन से है। बालक के विकास में उसके शारीरिक विकास, उसकी मानसिक क्षमता का विकास तथा उसके सामाजिक एवं सांवेगिक अनुकूलन का भी अध्ययन किया जाता है। बाल विकास की प्रक्रिया निरन्तर एक क्रमिक रूप से चलती है।

विकास के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत

1. ईरा जी. जॉर्डन के अनुसार: "विकास ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म से लेकर उस समय तक निरन्तर चलती रहती है जब तक कि वह पूर्ण विकास को प्राप्त नहीं हो जाता।"
2. ई.बी. हरलॉक के अनुसार: "विकास प्रगतिशील परिवर्तनों का एक नियमित, क्रमिक तथा सम्बद्ध क्रम है जो कि परिपक्वता की प्राप्ति की ओर निर्देशित रहता है। यह आकस्मिक नहीं होता, परन्तु इसमें प्रत्येक अवस्था आगामी विकासात्मक क्रम के बीच निश्चित सुसंबद्ध रहती है।"
संक्षेप में कहें तो विकास बड़े होने तक सीमित नहीं है। वस्तुतः यह व्यवस्थित एवं समानुपात प्रगतिशील क्रम है जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होता है।
3. शैсел के अनुसार: "विकास एक प्रकार का परिवर्तन है जिसके द्वारा बच्चों में नई विशेषताओं तथा क्षमताओं का प्रादुर्भाव होता रहता है।"
4. हैरिस के अनुसार: "विकास जीवित प्राणी को संरचना की जटिलता की दिशा में एक समयानुसार गतिक्रम है।"
5. जेम्स ड्रेवर के अनुसार: "विकास वह दशा है जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में प्राणी में सतत रूप से व्यक्त होती है। यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी प्राणी में भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक होता है। यह विकास तंत्रिका तंत्र को सामान्य रूप से नियंत्रित करता है। यह प्रगति का मापदण्ड है और इसका आरम्भ शून्य से होता है।"
6. पीकूनस और असक्रेच के अनुसार: "विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चे या व्यक्ति की क्षमताओं का प्रस्फुटन होता है और उनमें नई योग्यताओं में, नए कौशल, गुणों और विशेषताओं का समावेश होता है साथ ही उसमें मानव प्राणी की वृद्धि, ऊँचे दर्जे की विभिन्नता, जटिलता, कुशलता, उसकी शिराओं तथा संरचनात्मक समस्याओं का अपचय परिपष्पीकरण तथा उनके कार्यात्मक एवं अनुकूलनात्मक योग्यता के अपक्षय अन्तर्निहित रहता है।"
7. एम.ई. ब्रेकतीज तथा ई. ली. विन्सेन्ट के अनुसार: "विकास व्यक्ति की क्षमताओं का क्रमिक आविर्भाव और विस्तार है जो कि उसे अनुक्रियात्मक रूप में कार्य करने की सुगमता प्रदान करता है। यह विकास व्यक्ति और उसके वातावरण के मध्य गत्यात्मक सम्बन्ध से सम्भव होता है, इस प्रकार बालक और वातावरण के बीच निरन्तर अन्योन्य क्रिया अनेक और जटिल परिवर्तनों को जन्म देती है और इसे विकास कहा जाता है।"
8. जीन पियाजे (Jean Piaget) के अनुसार: "विकास का क्रम अनवरत होकर सार्वभौम है। अलग-अलग प्राणियों में यह अलग-अलग पाया जाता है। व्यक्ति परिवेश में विकसित आवश्यकताओं को पूर्ण करने की प्रक्रिया द्वारा ही विकास पथ पर बढ़ता है।"
अंत में हम कह सकते हैं कि वातावरण के प्रभाव के कारण जो परिवर्तन व्यक्ति में होते हैं वही विकास है। बच्चों के जीवन के अध्ययन करने के पश्चात ही इस बात का पता चलता है कि उनके भिन्न-भिन्न वय-स्तर पर एक विशेष प्रकार के परिवर्तन होते हैं और उनका विकास होता है। यह क्रम गर्भाधान से लेकर जीवन पर्यन्त तक अवधिगति से प्रगतिशील रहता है।
9. ई.एल. टेलर के अनुसार: "मनुष्य जो कुछ रहता है जो कुछ दिखता है वह हर पल, प्रतिक्षण परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरकर परिवर्तन की ओर उन्मुख होता है। यही आगे चलकर मानव जीवन की शैली कहलाती है।"

अभिवृद्धि का अर्थ

अभिवृद्धि का अर्थ शारीरिक शिराओं, अवयवों तथा संस्थाओं में आकार की वृद्धि को प्राप्त होने से है तथा उनके आकार और परिमाण में परिवर्तन होने से है। इससे बालक की लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई में परिवर्तन होता ही है बालक की कार्यक्षमता का भी विकास होता है। अतः अभिवृद्धि का आशय आकार बढ़ने से है (इस बढ़ने में शरीर के आंतरिक व बाह्य अंगों का विकास से है। चाहे सिर, धड़, हाथ-पैरों, हृदय या मस्तिष्क आदि क्यों न हो, विकास रूप के आकार में परिवर्तन है और अभिवृद्धि आकार में विकास से है)।

बाल विकास एवं अभिवृद्धि में अंतर

बाल विकास पितृ सूत्रों की रचना, वंशानुक्रम, गर्भाधान के बाद पड़ने वाले प्रभावों आदि से प्रभावित होता है। विकास के जैविक स्वरूप की व्याख्या जीवन प्रतिमान के सन्दर्भ में सभी अवस्थाओं में की जाती है क्योंकि विकास सभी पक्षों को लेकर चलता है। बालक की अभिवृद्धि का संबंध शारीरिक और मानसिक वृद्धि और वातावरण से संबंधित है। विकास प्राणी में होने वाले कुल परिवर्तन का योग है जबकि अभिवृद्धि किसी विशेष पक्ष अथवा आंशिक स्वरूप को व्यक्त करती है।
संक्षेप में अभिवृद्धि और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही बालविकास के अध्ययन में अहम् भूमिका निभाते हैं।
इस संबंध में उल्लेखनीय है कि अभिवृद्धि में विकास का प्रतिमान समान नहीं होता। अभिवृद्धि में व्यक्तिगत भेद पाये जाते हैं। प्रत्येक बालक की अभिवृद्धि अलग-अलग होती है जबकि विकास-पदों में समानता पायी जाती है। अभिवृद्धि पर वातावरणीय कारकों का प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति अपने वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और परिपक्वता के विकास का सीधा सम्बन्ध अभिवृद्धि से है।

बाल विकास का अधिगम से सम्बन्ध

जन्म लेने के पश्चात व्यक्ति अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण में घिरा पाता है, व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताएं इसी भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही पूरी होती हैं। परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को कुछ न कुछ अपने वातावरण में संघर्ष अथवा अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह अपनी आयु के अनुसार प्राप्त अनुभवों के आधार पर परिवर्तन लाता है। यह परिवर्तन लाना ही एक प्रकार का सीखना है। बालक जन्म लेने के पश्चात ही सीखना प्रारंभ कर देता है जिससे उसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक संवेगात्मक परिवर्तन होने लगते हैं।
वास्तव में 'सीखना' किसी स्थिति के प्रति एक सक्रिय प्रतिक्रिया है। इस प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप ही व्यक्ति के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होते हैं। प्रत्येक क्रिया एक अनुभव देती है और अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। सीखना (अधिगम) के बगैर विकास सार्थक एवं फलदायी नहीं हो सकता।
बाल-विकास एवं अधिगम एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बगैर दूसरा अपूर्ण है। यदि एक बालक केवल शारीरिक रूप से वृद्धि कर रहा है परन्तु वह जीवन के लिए उपयोगी व्यवहारों एवं जीवन जीने की कला नहीं सीख पाता तो विकास की सच्ची अवधारणा अपूर्ण रहेगी। बालक अपनी आयु के अनुसार अधिगम उपागमों को प्राप्त करता है। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था एवं प्रौढ़ावस्था आदि में व्यक्ति का अधिगम स्तर अलग-अलग होता है। अधिगम के बगैर विकास असंभव है। आयु के साथ-साथ व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर सीखता रहता है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा सीखने (अधिगम) की परिभाषाएं

1. गेट्स के अनुसार: "अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन और परिमार्जन करना ही सीखना है।"
2. कानवेक के अनुसार: "सीखना, अनुभव के फलस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन द्वारा अभिव्यक्त होता है।"
3. स्किनर के अनुसार: "सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रक्रिया है।"
4. कौलविन के अनुसार: "अनुभव के आधार पर हमारे पूर्व निर्मित व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया ही सीखना है।"
5. वुडवर्थ के अनुसार: "नवीन ज्ञान और प्रक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।"
6. डगलस और हालैण्ड के अनुसार: "सीखना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति नवीन प्रकार के व्यवहारों में परिवर्तन करता है नवीन व्यवहार को अपनाता है।"
7. क्रो एण्ड क्रो के अनुसार: "सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।"
8. जे.पी. गिलफोर्ड के अनुसार: "व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।"
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इंसान के अनुभव, व्यवहार, प्रशिक्षण, नवीन ज्ञान प्राप्ति प्रक्रिया, आदतों आदि में परिवर्तन होना आदि व्यक्ति की उम्र के आधार पर निर्भर करते हैं। अतः विकास के साथ ये परिवर्तन भी वांछनीय हैं इनका होना स्वाभाविक है।
इसलिए एक बालक को सही दिशा प्रदान करने के लिए बालविकास का ज्ञान अति आवश्यक है ताकि बच्चा जीवन के सारगर्भित तथ्यों में जीवन मूल्यों को प्राप्त कर सम्पूर्ण समाज व देश की उन्नति में अपना अमूल्य सहयोग देते हुए जीवन निर्वाह कर सके।

व्यापमं परीक्षा हेतु नमूनार्थ कुछ वैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1. भ्रूण अवस्था कहलाती है?
(A) गर्भाधान से लेकर जन्म के एक माह पूर्व तक का काल
(B) गर्भाधान से लेकर जन्म लेने के 15 दिनों के बाद तक
(C) गर्भाधान से लेकर बालक के जन्म तक
(D) गर्भाधान से लेकर नौ माह की स्थिति तक

प्रश्न 2. सामान्यतः भ्रूणव्यवस्था का काल हो सकता है?
(A) 8 से 9 माह
(B) 9 से 10 माह
(C) 8 से 10 माह
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 3. भ्रूणवस्था कितने दिनों की होती है?
(A) 280 दिन
(B) 210 दिन
(C) 250 दिन
(D) 265 दिन

प्रश्न 4. विकास का अर्थ बालक के किस विकास के संदर्भ में है?
(A) बालक का शारीरिक एवं मानसिक विकास
(B) बालक का सांवेगिक एवं बौद्धिक विकास
(C) बालक का आर्थिक एवं सामाजिक विकास
(D) उपरोक्त समस्त विकास

प्रश्न 5. "परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था, जिसमें बच्चा भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाता है।" यह मत है?
(A) हरलॉक का
(B) मुनरो का
(C) पियाजे का
(D) थार्नडाइक का

प्रश्न 6. विकास वह प्रक्रिया है जो:
(A) जन्म से लेकर प्रौढ़ावस्था तक चलती है
(B) जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती है
(C) गर्भाधान से लेकर जीवन पर्यन्त तक चलती है
(D) जन्म से लेकर जीवन पर्यन्त तक चलती है

प्रश्न 7. मानव विकास की प्रथम अवस्था कहलाती है?
(A) शैशवावस्था
(B) बाल्यावस्था
(C) वृद्धावस्था
(D) किशोरावस्था

प्रश्न 8. सतत रूप से चलने वाली प्रक्रिया है?
(A) विकास
(B) अधिगम
(C) विकास एवं अधिगम
(D) उपरोक्त में कोई नहीं

प्रश्न 9. बाल विकास के सम्बन्ध में किस बात का अध्ययन आवश्यक नहीं है?
(A) आयु के साथ होने वाले परिवर्तनों का क्या स्वरूप है
(B) बालक में होने वाले परिवर्तन व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं
(C) क्या सभी बालकों में विकास समान रूप से होता है
(D) बालक के माता पिता का आर्थिक विकास हो रहा है या नहीं?

प्रश्न 10. "विकास प्रगतिशील परिवर्तनों का एक नियमित, क्रमिक एवं सम्बद्ध क्रम है। विकास निरन्तर चलता है जब तक कि पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लिया जाता। यह मत निम्न में से किस विद्वान का है?
(A) हरलॉक
(B) जेम्स ट्रेवर
(C) ईरा जी. जॉर्डन
(D) पियाजे

प्रश्न 11. बालविकास सन्दर्भ में 'अभिवृद्धि' का आशय किससे है?
(A) शरीर का आकार बढ़ना
(B) बुद्धि कौशल को बढ़ना
(C) धनसम्पदा में वृद्धि
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 12. अभिवृद्धि में:
(A) प्रत्येक बालक की अभिवृद्धि अलग-अलग होती है
(B) सभी बालकों में अभिवृद्धि समान होती है
(C) विकास की तरह अभिवृद्धि में विकास पदों में समानता पाई जाती है
(D) उपरोक्त सभी

प्रश्न 13. बालविकास एवं अधिगम एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि:
(A) विकास के बगैर अधिगम प्राप्ति असंभव है
(B) अधिगम के बगैर सच्चा विकास संभव नहीं है
(C) विकास के साथ अधिगम चलता रहता है
(D) उपरोक्त सभी कथन सत्य हैं

प्रश्न 14. "सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।" यह मत है?
(A) गेट्स का
(B) को एण्ड को का
(C) गिलफोर्ड का
(D) पियाजे का

प्रश्न 15. एक अभिभावक के लिए बालविकास का अध्ययन आवश्यक है क्योंकि:
(A) बालक का समुचित विकास हो सके
(B) अधिगम में शिक्षक की सहायता कर सके
(C) अधिगम के लिए उपयुक्त माहौल तैयार कर सके
(D) उपरोक्त (A) एवं (C) सही है

प्रश्न 16. बालक के जन्म से पूर्व तथा जन्म के पश्चात जो भी परिवर्तन दिखाई देते हैं, वे हैं?
(A) विकास के अंग
(B) जन्मपूर्व विकास के अंग
(C) जन्म के बाद के विकास के अंग
(D) उपरोक्त कोई नहीं

प्रश्न 17. निर्माणकारी अवस्था मानी जाती है?
(A) भ्रूणवस्था
(B) शैशवावस्था
(C) बाल्यावस्था
(D) किशोरावस्था

प्रश्न 18. जन्म के बाद बच्चा कुछ विशिष्ट परिवर्तनों की ओर संकेत करता है जैसे - गति, भाषा, संवेग, सामाजिकता आदि एवं ये लक्षण प्रकट होने लगते हैं यह विकास क्रम किससे प्रभावित होता है?
(A) आनुवांशिकी से
(B) माता-पिता की आदतों से
(C) जन्मजात प्रवृत्तियों से
(D) वातावरण से

प्रश्न 19. इंसान को बढ़ने (बड़े होने) या कद या भार बढ़ने का अर्थ ही विकास नहीं है तो निम्न में से विकास का अर्थ नहीं होगा?
(A) विकास में परिपक्वता की ओर बढ़ने का निश्चित क्रम होता है
(B) यह एक प्रगतिशील श्रृंखला होती है
(C) प्रगति का अर्थ भी दिशा बोध युक्त होता है
(D) विश्वविद्यालयीन शिक्षा प्राप्ति ही सच्चा विकास करना है

प्रश्न 20. विकास का मापन तीन पक्षों में किया जा सकता है - अ-शरीर रचना, ब-शरीर शास्त्र, स-व्यवहारिक। यह मत है?
(A) जेम्स ट्रेवर का
(B) हरलॉक का
(C) पियाजे का
(D) गैलन का

प्रश्न 21. "बाल विकास बड़े होने तक ही सीमित नहीं है। वस्तुतः यह तो व्यवस्थित एवं समानुपात प्रगतिशील क्रम है जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होता है।" यह मत है?
(A) हरलॉक का
(B) पियाजे का
(C) थार्नडाइक का
(D) मुनरो का

प्रश्न 22. विकास का आरंभ शून्य से होता है यह मत है?
(A) गैलन का
(B) हरलॉक का
(C) मुनरो का
(D) जेम्स ट्रेवर का

प्रश्न 23. बाल विकास के अध्ययन ने समाज के समक्ष दो पहलू प्रस्तुत किए हैं पहला - व्यवहारिक और दूसरा - सैद्धांतिक। इन पक्षों का ज्ञान आवश्यक है?
(A) शिक्षक के लिए
(B) अभिभावक के लिए
(C) बुद्धिजीवी वर्ग के लिए
(D) शिक्षक एवं अभिभावक दोनों के लिए

प्रश्न 24. विकास के विभिन्न सिद्धांतों और अवस्थाओं का ज्ञान माता-पिता और शिक्षक के लिए बड़ा उपयोगी है जिसमें बालक के लिए उतना आवश्यक नहीं है?
(A) उचित वातावरण मिले
(B) संतुलित भोजन मिले
(C) मँहगे कपड़े मिले
(D) अच्छी संगति मिले

प्रश्न 25. "यदि हम बोलना सीखते बालकों को बोलना सिखाते तो शायद कभी बोलना नहीं सीखते।" यह मत है?
(A) विलियम हल का
(B) थार्नडाइक का
(C) पियाजे का
(D) हरलॉक का

प्रश्न 26. 'बच्चे के उचित विकास को सुनिश्चित करने के लिए उसका स्वस्थ शारीरिक विकास एक महत्वपूर्ण पूर्व आवश्यकता है।' यह कथन:
(A) सही है, क्योंकि विकास-क्रम में शारीरिक विकास सबसे पहले स्थान पर आता है
(B) सही है, क्योंकि शारीरिक विकास, विकास के अन्य पक्षों के साथ अंतःसम्बन्धित है
(C) गलत है, क्योंकि शारीरिक विकास, विकास के अन्य पक्षों को किसी प्रकार से भी प्रभावित नहीं करता
(D) गलत हो सकता है, क्योंकि विकास नितांत व्यक्तिगत मामला है

उत्तर शीट

प्रश्न 1. उत्तर (D)
प्रश्न 2. उत्तर (B)
प्रश्न 3. उत्तर (A)
प्रश्न 4. उत्तर (D)
प्रश्न 5. उत्तर (B)
प्रश्न 6. उत्तर (C)
प्रश्न 7. उत्तर (A)
प्रश्न 8. उत्तर (A)
प्रश्न 9. उत्तर (D)
प्रश्न 10. उत्तर (C)
प्रश्न 11. उत्तर (A)
प्रश्न 12. उत्तर (A)
प्रश्न 13. उत्तर (D)
प्रश्न 14. उत्तर (B)
प्रश्न 15. उत्तर (D)
प्रश्न 16. उत्तर (A)
प्रश्न 17. उत्तर (B)
प्रश्न 18. उत्तर (D)
प्रश्न 19. उत्तर (D)
प्रश्न 20. उत्तर (A)
प्रश्न 21. उत्तर (A)
प्रश्न 22. उत्तर (D)
प्रश्न 23. उत्तर (D)
प्रश्न 24. उत्तर (C)
प्रश्न 25. उत्तर (D)
प्रश्न 26. उत्तर (B)

आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope, the above information will be useful and important.)
Thank you.
R.F. Tembhre
(Teacher)
EduFavour.Com

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